कला और समाज का अंतर्संबंध
DOI:
https://doi.org/10.64171/JSRD.5.1.70-72Keywords:
कला, समाज, अभिव्यक्ति, तकनीकी, प्रयोग, सृजनात्मक, विषय-वस्तु, मूर्त, अमूर्तAbstract
समाज मानव समुदाय का एक संगठन है जिसमें मनुष्य जन्म से मरण तक की क्रियाएं करता है। समाज के बिना मनुष्य के जीवन का कोई महत्व नहीं है, तथा समाज ही मानव जाति की सुरक्षा और विकास का मूल आधार है। कहा जाता है कि कला समाज का दर्पण है। अतः कलाकार अपने वातावरण, परिस्थितियों व समाज के इर्द-गिर्द ही मनन-चिन्तन करता है तथा कला के माध्यम से अभिव्यक्ति करता है। इस प्रकार हम कह सकते है कि कला के लिए समाज का होना ठीक वैसे ही आवश्यक है जैसे समाज के लिए कला का होना। प्राचीन काल से ही कलाएँ मानव समाज के लिए अभिव्यक्ति का कार्य कर रही हैं। जब भाषा नहीं थी तब भी जिन सांकेतिक रेखाओं के माध्यम से आदिमानवों ने अपनी अभिव्यक्ति की उसे आज हम कला के अन्तर्गत ही सम्मिलित करते हैं। कला न सिर्फ एक व्यवस्था है अपितु समयानुसार समाज को प्रतिबिम्बित करने का माध्यम है। समाज में उत्थान हो या पतन, कलाएँ सदैव ही उन परिस्थितियों को प्रदर्शित करने के लिए तत्पर रही है। कला के विभिन्न माध्यमों द्वारा कलाकार ने कभी वीर रस तो कभी शृंगार रस, कभी करूण रस तो कभी शान्त रस के द्वारा समाज में अभिव्यक्ति की है। कला और समाज के अंतर्संबंध के अन्तर्गत मैनें इस शोध पत्र में कला व समाज के परस्पर सम्बन्धों को बताते हुए कलाकार का समाज के प्रति दायित्वों का भी उल्लेख किया है । साथ ही साथ वर्तमान समय में कला के विभिन्न स्वरूपों का समाज के प्रति योगदान के बारे में भी विस्तृत वर्णन करने का किया है ।
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