Journal of Social Review and Development
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<p><strong>Journal of Social Review and Development</strong> is an international, peer-reviewed, refereed, and open-access journal, which publishes works from a wide range of fields, including anthropology, criminology, economics, education, geography, history, law, linguistics, political science, psychology, social policy, social work, sociology, humanities, social science, philosophy, international relations, public administration, social welfare, religious studies, visual arts, women studies, development studies, library and information science, linguistics, and so on.</p>Dzarc Publicationsen-USJournal of Social Review and Development2583-2816विकसित भारत की संकल्पना में प्राचीन व्यापार का वैशिष्ट्य
https://dzarc.com/social/article/view/1074
<p>किसी भी सभ्यता की बुनियाद उसकी आर्थिक संरचना होती है। समाज का निरन्तर विकास एक सुदृढ़ अर्थव्यवस्था पर निर्भर करता है इसीलिए प्राचीन भारत में प्रचलित पुरुषार्थ सिद्धान्त में ‘अर्थ’ को महत्व दिया गया था। प्राचीन काल में ‘अर्थ’ को अर्जित के प्रमुख साधनों में व्यापार भी शामिल था। आधुनिक युग में भी समाज को विकसित करने में व्यापार की भूमिका अत्यंत आवश्यक होती है। भारत को 2047 तक विकसित करने में व्यापार सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयाम सिद्ध होगा। व्यापार से देश का आर्थिक तंत्र मजबूत होता है। प्राचीन भारत के व्यापारिक अनुभवों को आत्मसात करके नवीन व्यापारिक तंत्र की मूर्त संकल्पना कर सकते हैं। भारत के आयात-निर्यात एवं व्यापार संतुलन को निर्धारित करके देश के व्यापार को समृद्ध किया जा सकता है। प्राचीन भारत के व्यापार में कई समयांतरालों भारत का व्यापार संतुलन सकारात्मक रहा है और प्राचीन भारत में विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन एवं निर्यात कर बहुत सा धन अर्जित किया जाता था। रोम से होने वाले व्यापार में भारत को वहाँ से हर वर्ष 55 करोड़ सेस्टर्स की प्राप्ति होती थी। मसाले, हीरे, इस्पात, वस्त्र आदि निर्यात प्रमुख वस्तुएँ थीं। रोम प्रतिवर्ष भारत की विलासिता सामग्री मँगाने पर 10 करोड़ सेस्टर्स व्यय करता था तथा अपने स्वर्ण से भुगतान करता था। ‘प्लिनी’ भारत की ओर इस स्वर्ण प्रवाह देखकर दुःख प्रकट करता है। इस प्रकार के व्यापार में प्राचीन भारत में व्यापार को अत्यंत लाभदायक बनाया था। अतः आधुनिक समय में भी अन्य देशों की आवश्यकतानुसार वस्तुओं का उत्पादन कर व्यापार में अच्छा लाभ अर्जित किया जा सकता था।</p>सपना जायसवाल
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3010310.64171/JSRD.5.S3.1-3चीन और पाकिस्तान के साथ भारत की सुरक्षा चिन्ताओं का एक राजनैतिक तुलनात्मक
https://dzarc.com/social/article/view/1075
<p>राजनैतिक विश्लेष्कों के अनुसार चीन और पाकिस्तान दोनों ही राष्ट्र शुरू से ही भारत को अपना चिर विरोधी और प्रतिद्वन्दी राष्ट्र मानते रहे हैं, चाहे प्रश्न आर्थिक स्तर पर हो या सामाजिक। भारत अपनी स्वतंत्रता के बाद से समय-समय पर विशेष प्रयास करता रहा है कि दोनों ही राष्ट्रों से सम्बंध मधुर बने रहे लेकिन कभी सीमा विवाद तो कभी आतंकवाद जैसी समस्याऐं भारत के समक्ष हमेशा आती रही हैं कई बार चीन और पाकिस्तान भारत को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कमतर दिखाने के लिए एक साथ खड़े होते हुये भी नजर आये हैं। इन्हीं सब कारणों से भारत की सुरक्षा चिन्ताऐं इन दोनों ही राष्ट्रों के प्रति बढ़ जाती है।<br>भारत अपने पड़ौसी राष्ट्रों के साथ सामरिक, व्यापारिक, रणनीतिक और साझेदारी नीतियों में साॅफ्ट नीति व मैत्रीभाव को अपनाता है वहीं बात करे यदि चीन और पाकिस्तान की तो वह अपने पड़ौसी राष्ट्रों के साथ विरोधी नीति और हार्ड नीति अपनाते है। इस शोध पत्र के माध्यम से भारत और चीन के मध्य सीमा विवाद, सैन्यीकरण और सामरिक समस्याओं का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। शोध पत्र में चीन-पाकिस्तान गठजोड से भारत की बढ़ती सुरक्षा चिन्ताओं का राजनैतिक विश्लेष्णात्मक अध्ययन किया गया है।</p>अंजू आर्य
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3040710.64171/JSRD.5.S3.4-7सतत विकासोन्मुख शिक्षक शिक्षा में स्वदेशी ज्ञान प्रणालियाँ, पाठ्यचर्या नवाचार एवं डिजिटल एकीकरणः एक समावेशी दृष्टिकोण
https://dzarc.com/social/article/view/1076
<p>यह शोध-लेख स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों को सतत विकास के लिए शिक्षा के साथ समेकित करने की संभावनाओं, औचित्य और शैक्षिक निहितार्थों का विश्लेषण करता है। अध्ययन का केंद्रीय तर्क यह है कि शिक्षक शिक्षा को केवल ज्ञान-संप्रेषण की प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से जड़ित, अनुभवात्मक, अंतर्विषयक और भविष्य-उन्मुख निर्माण-प्रक्रिया के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखादृविद्यालयी शिक्षा 2023 जैसे दस्तावेजों में स्थानीय संदर्भ, बहुविषयक अधिगम, मातृभाषा-आधारित शिक्षा और अनुभवात्मक शिक्षण पर बल दिया गया है, जो स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों दृसतत विकास के लिए शिक्षा समन्वय के लिए सशक्त आधार प्रदान करते हैं। उत्तराखंड जैसे हिमालयी क्षेत्र में पारंपरिक कृषि, जल-संरक्षण, वन-प्रबंधन, लोक-परंपराएँ, औषधीय ज्ञान और सामुदायिक जीवन-सरणियाँ शिक्षा के लिए जीवंत संसाधन हैं। अध्ययन यह भी दर्शाता है कि डिजिटल एकीकरण, आईसीटी और ज्ञान के डिजिटलीकरण के माध्यम से स्थानीय ज्ञान को संरक्षित, सुलभ और शिक्षण-अधिगम के लिए अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है। साथ ही, यह लेख शिक्षक तैयारी, पाठ्यचर्या पुनर्संरचना, समावेशिता, मूल्य-आधारित शिक्षा तथा नीति-क्रियान्वयन की चुनौतियों पर भी प्रकाश डालता है। निष्कर्षतः, स्वदेशी ज्ञान, सतत विकास के लिए शिक्षा और डिजिटल एकीकरण का समन्वय एक ऐसे शिक्षक निर्माण की ओर संकेत करता है जो सांस्कृतिक रूप से उत्तरदायी, पर्यावरण-सचेत, तकनीकी रूप से सक्षम और सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध हो।<br>यह शोध-लेख स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों को सतत विकास के लिए शिक्षा (सतत विकास के लिए शिक्षा) के साथ समेकित करके शिक्षक शिक्षा को अधिक समावेशी, संदर्भानुकूल और परिवर्तनकारी बनाने की संभावना का विश्लेषण करता है। अध्ययन का केंद्रीय तर्क यह है कि शिक्षा केवल पाठ्य-पुस्तकीय ज्ञान के संप्रेषण तक सीमित न रहकर स्थानीय जीवन, सांस्कृतिक विरासत, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और सामुदायिक अनुभवों से जुड़ी होनी चाहिए।</p>दिनेश कुमारतरूण कुमार
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3081210.64171/JSRD.5.S3.8-12डिजिटल युग में भारतीय ज्ञान प्रणालीः सोशल मीडिया पर विश्वसनीयता, चुनौतियाँ एवं शैक्षिक संभावनाएँ
https://dzarc.com/social/article/view/1077
<p>वर्तमान डिजिटल परिप्रेक्ष्य में सोशल मीडिया ज्ञान-विनिमय, विचार-संप्रेषण और सांस्कृतिक संवाद का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा है, जिसके द्वारा भारतीय ज्ञान प्रणाली में निहित प्राचीन दर्शन, पारंपरिक विज्ञान, लोकज्ञान, आयुर्वेद, योग तथा प्रकृति-आधारित जीवन दृष्टि व्यापक जनसमूह तक पहुँच रही है। इस अध्ययन का उद्देश्य सोशल मीडिया पर उपलब्ध भारतीय ज्ञान प्रणाली -संबंधित सामग्री की विश्वसनीयता, उससे जुड़ी चुनौतियों तथा उसकी शैक्षिक उपयोगिता का सम्यक् विश्लेषण करना है। यद्यपि सोशल मीडिया ने ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया को तीव्र गति प्रदान की है, तथापि अपूर्ण, संदर्भहीन अथवा अप्रमाणित जानकारी का तीव्र प्रसार वास्तविक ज्ञान की अवधारणा को प्रभावित करता है। तथ्य-जांच की कमी, एल्गोरिथ्म-आधारित प्रसार प्रणाली तथा व्यावसायिक दृष्टिकोण से निर्मित सामग्री इस क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियाँ हैं, जिनके कारण शिक्षार्थियों के लिए सत्य और असत्य के मध्य भेद करना जटिल हो जाता है। इसके बावजूद, यदि शैक्षणिक संस्थान, विशेषज्ञ एवं शोधकर्ता प्रमाणिक स्रोतों पर आधारित सामग्री का निर्माण एवं प्रसार करें, तो सोशल मीडिया भारतीय ज्ञान प्रणाली के शैक्षिक संवर्धन का प्रभावी साधन सिद्ध हो सकता है, जो संवादात्मक अधिगम, दृश्य-श्रव्य सामग्री तथा वैश्विक स्तर पर ज्ञान-साझाकरण के अवसर प्रदान करता है। निष्कर्षत यह आवश्यक है कि भारतीय ज्ञान प्रणाली की गरिमा एवं प्रामाणिकता बनाए रखने हेतु डिजिटल नैतिकता, मीडिया साक्षरता तथा अकादमिक सत्यापन की प्रक्रियाओं को सुदृढ़ किया जाए, जिससे सोशल मीडिया विश्वसनीय एवं शिक्षणोपयोगी मंच के रूप में विकसित हो सके।</p>राजश्री पुरसेठ
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3131910.64171/JSRD.5.S3.13-19उत्तराखंड के परंपरागत ताम्रशिल्पकरो पर आधुनिकता का प्रभाव
https://dzarc.com/social/article/view/1078
<p>भारतीय सामाजिक व्यवस्था में व्यवसाय को परंपरागत रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी व्यावसायिक परंपराओं के रूप में आगे बढ़ाया गया लेकिन धीरे-धीरे परिवर्तन की क्रांति की शुरुआत में इन परंपरागत व्यवसाययों पर अपना प्रभाव डाला और धीरे-धीरे उनकी पहचान पर संकट गहराने लगा उत्तराखंड में शिल्प के परंपरागत कार्य के आधार पर अपनी पहचान बनाने वाले लोगों को शिल्पकार कहा जाता है किंतु आज यह शिल्पी आधुनिकीकरण एवं नगरीकरण के फल स्वरुप अपनी पहचान के संकट से गुजर रहे हैं प्रस्तुत लेख के अंतर्गत उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के अल्मोड़ा शहर में विलुप्त होती परंपरागत ताम्र शिल्प कला पर आधुनिकीकरण व नगरीकरण के प्रभाव को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।</p>रचना टम्टा
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3202110.64171/JSRD.5.S3.20-21भारत में उच्च शिक्षा के सकल नामांकन अनुपात की प्रगति का विश्लेषणात्मक अध्ययनः राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में
https://dzarc.com/social/article/view/1079
<p>प्रस्तुत शोध पत्र भारत में उच्च शिक्षा के सकल नामांकन अनुपात (GER) की 2014-15 से 2021-22 तक की प्रगति का विश्लेषण करता है। अध्ययन राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 द्वारा निर्धारित 2035 तक 50 प्रतिशत GER के लक्ष्य के संदर्भ में किया गया है। शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रकाशित AISHE की वार्षिक रिपोर्टों के द्वितीयक आंकड़ों के विश्लेषण से ज्ञात होता है कि भारत का कुल GER 2014-15 के 23.7 से बढ़कर 2021-22 में 28.4 हो गया - सात वर्षों में 4.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अध्ययन लैंगिक समानता, SC/ST वर्गों की भागीदारी तथा 2035 के लक्ष्य की दिशा में वर्तमान प्रगति की गहन समीक्षा प्रस्तुत करता है। निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि जेण्डर पैरिटी इण्डेक्स (GPI) 2021-22 में 1.01 पहुंच गया हैय तथापि SC एवं ST वर्गों का GER राष्ट्रीय औसत से अभी भी क्रमशः 2.5 और 7.2 प्रतिशत कम है। 2035 तक NEP-2020 के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु वर्तमान वृद्धि दर को कम से कम तीन गुना तीव्र करना आवश्यक है।</p>सुविता कुमारी
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3222810.64171/JSRD.5.S3.22-28महिलाओं का विज्ञान के क्षेत्र में योगदान
https://dzarc.com/social/article/view/1080
<p>समाज में महिलाओं की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। महिलाएं समाज की रीढ़ होती हैं और विभिन्न क्षेत्रों जैसे परिवार, अर्थव्यवस्था, राजनीति और संस्कृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। समाज में महिलाओं की भूमिका बहुआयामी होती है जिसमें वे परिवार की देखभाल से लेकर आर्थिक विकास, शिक्षा और सामाजिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। भारतीय इतिहास में कई महिलाओं ने विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए सत्ता में आकर समाज से सम्मान और सम्मान प्राप्त किया है आजादी के बाद महिलाओं का समाज में सम्मान बढ़ा, लेकिन उनके सशक्तिकरण की गति दशकों तक धीमी रही। गरीबी व निरक्षरता महिलाओं की प्रगति में गंभीर बाधा रही हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल के माध्यम से महिलाओं को व्यवसाय की ओर प्रोत्साहित कर इन्हे आर्थिक रूप से सुदृढ़ किया जा सकता है। 19वीं सदी में महिलाओं ने शिक्षा, स्वास्थ्य और कामकाजी परिस्थितियों जैसे कई क्षेत्रों में सक्रिय रूप से अभियान चलाया। वे महिलाओं के अधिकारों में बदलाव चाहती थीं और लिंगों के बीच समानता स्थापित करना चाहती थीं। यह महिलाओं के इतिहास में एक प्रभावशाली विकास था। 19वीं सदी के अंत तक, नारीवाद को महिलाओं के अधिकारों की वकालत करने वाले व्यक्तियों के एक समूह के रूप में मान्यता मिल गई थी।</p>Praveen Pathak
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3293210.64171/JSRD.5.S3.29-32गंगा-यमुना घाटी के स्रोत प्रदेशों की विशिष्ट भवन स्थापत्य विरासतः भूकम्परोधी
https://dzarc.com/social/article/view/1093
<p>ऐतिहासिक एंव सांस्कृतिक परम्पराओं से अभिभूत गंगा-यमुना नदी घाटी के स्रोत प्रदेश नदी घाटी क्षेत्र की धर्म, इतिहास, संस्कृति व साहित्य एवं स्थापत्य कला के क्षेत्र में अपनी एक पृथक पहचान रही है। देवात्मा स्वरूप हिमालय की चोटियाॅ तथा जीवन दायिनी पवित्र नदीयाॅ गंगा, यमुना के स्रोतो के प्रति भारतीय जनों में सदियो से ही श्रद्धा आकर्षण एवं जिज्ञासा रही है, फलतः अनेक ऋषि मुनियों, तपस्वियों एवं साहित्यिक साधकों व वाह्य जातियों के लिए यह विषम भौगोलिक पारिस्थिकीय क्षेत्र आश्रय बना रहा, वाहय जातियाॅ इस भू-भाग से प्रभावित हुई परिणामतः द्वितीय सहस्त्राब्दी ई0 पूर्व के मध्य में अनेक वाहय जातियो का आगमन इन घाटी क्षेत्रो में होना प्रराम्भ हुआ तथा अधिकांश ने इसी भू-भाग को अपना आधिवास बनाया।</p>सुशील कुमार कगडियाल
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3333710.64171/JSRD.5.S3.33-37आत्मनिर्भर भारत और राज्य की भूमिकाः एक राजनीतिक विश्लेषण
https://dzarc.com/social/article/view/1082
<p>आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना समकालीन भारतीय राजनीति, अर्थव्यवस्था और विकास विमर्श में एक केंद्रीय वैचारिक ढाँचे के रूप में उभरकर सामने आई है। वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी की अभूतपूर्व परिस्थितियों के बीच भारत सरकार द्वारा घोषित ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ ने यह स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रीय विकास की प्रक्रिया को केवल वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं और बाहरी निर्भरता के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इस अभियान का उद्देश्य आर्थिक पुनरुत्थान, घरेलू उत्पादन को बढ़ावा, रोजगार सृजन, तकनीकी एवं औद्योगिक आत्मनिर्भरता तथा राष्ट्रीय आत्मविश्वास के सुदृढ़ीकरण से जुड़ा रहा है। किंतु आत्मनिर्भर भारत को केवल एक तात्कालिक आर्थिक पैकेज या विकासात्मक रणनीति के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह राज्य की भूमिका के पुनर्संरचन से जुड़ी एक व्यापक राजनीतिक और संस्थागत परियोजना भी है।<br>आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा का ऐतिहासिक, वैचारिक और राजनीतिक विश्लेषण करता है। इसमें स्वतंत्रता आंदोलन के स्वदेशी विचार, गांधीवादी आत्मनिर्भरता की अवधारणा, नेहरूवादी नियोजित विकास मॉडल तथा 1991 के बाद के उदारीकरणोत्तर राज्य की भूमिका को आत्मनिर्भर भारत के वर्तमान स्वरूप से जोड़कर समझने का प्रयास किया गया है। अध्ययन यह दर्शाता है कि समकालीन भारत में राज्य की भूमिका केवल नीति-निर्माता तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वह एक कल्याणकारी, नियामक और सहभागी अभिकर्ता के रूप में भी उभर रहा है। उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाएँ, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम, डिजिटल शासन, स्टार्ट-अप एवं एमएसएमई को समर्थन तथा केंद्र-राज्य समन्वय इस बदलती भूमिका के महत्वपूर्ण आयाम हैं।<br>आत्मनिर्भर भारत की वास्तविक सफलता सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक सहभागिता और सहकारी संघवाद पर निर्भर करती है। यदि आत्मनिर्भरता की नीतियाँ समाज के कमजोर, हाशिए पर पड़े और वंचित वर्गों को सशक्त बनाने में असफल रहती हैं, तो यह अवधारणा अपने लोकतांत्रिक और नैतिक उद्देश्य से भटक सकती है। साथ ही, वैश्वीकरण के संदर्भ में आत्मनिर्भर भारत को अंतरराष्ट्रीय अलगाव के रूप में नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता, संतुलित वैश्विक एकीकरण और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। अंततः यह अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि आत्मनिर्भर भारत तभी सार्थक, समावेशी और टिकाऊ हो सकता है जब राज्य आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण के बीच संतुलन स्थापित करते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों, संस्थागत पारदर्शिता और नागरिक सहभागिता को सुदृढ़ बनाए रखे।</p>अर्चना
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3384110.64171/JSRD.5.S3.38-41श्री गंगा जी का प्रदुर्भाव एवं भागीरथी ही गंगा, नाम की स्पष्टता
https://dzarc.com/social/article/view/1083
<p>प्रस्तुत प्रपत्र में श्री गंगा जी के उद्गम का समावेश कर गंगा नाम को लेकर जो भ्रामिकता बनी है, उसे स्पष्ट करने पर चर्चा की गई है। गंगा नदी हमारे राष्ट्र की जीवनदायिनी नदी है, जो युगों-युगों से हमें आध्यात्मिक, वैश्विक मूल्यों एवं धर्म, कर्म आदि सभी प्रकार की आस्थाओं से जोड़े हुई है। लेकिन इनके गंगा नाम पर कुछ हद तक भ्रमित किया जा रहा है। वर्तमान समय में लोगों को बताया जा रहा है, कि गंगा देवप्रयाग से बनती है जो कीहमारे पौराणिक शास्त्रों के अनुसार प्रामाणिक नहीं है, पुराणों में को ही गंगा कहा है, जो गौमुख से निकल कर गंगा सागर तक अविरल बह रही है,वही गंगा है। उक्त प्रपत्र द्वारा मुख्य रूप से भागीरथी ही गंगा है। गंगा देवप्रयाग से नहीं बल्कि गौमुख गंगोत्री से उद्धृत है। इस शोध पत्र में मुख्य रूप से स्पष्ट किया जाएगा।</p>आलोक नौटियाल
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3424510.64171/JSRD.5.S3.42-45भारतीय अर्थव्यवस्था पर होर्मुज संकट के प्रभाव का विश्लेषण
https://dzarc.com/social/article/view/1084
<p>होर्मुज जलडमरूमध्य एक बहुत ही महत्वपूर्ण जलमार्ग है जो दुनिया के अधिकांश तेल और प्राकृतिक गैस के परिवहन में मदद करता है। भारत अपनी ऊर्जा का 85% से अधिक अन्य देशों, विशेष रूप से मध्य पूर्व से प्राप्त करता है। यह पेपर विश्लेषण करता है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में संघर्ष या व्यवधान जैसी समस्याएं भारत की अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित कर सकती हैं। इस अध्ययन में 200 लोगों से सवाल पूछे गए और अन्य आंकड़ों का विश्लेषण करके जवाब प्राप्त किए गए। इससे पता चलता है कि तेल की कीमतें बढ़ने पर चीजें महंगी हो जाती हैं, जिसका असर भारत की मुद्रा और व्यापार पर पड़ता है। अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि भारत को ऊर्जा प्राप्त करने के लिए अलग-अलग तरीके खोजने चाहिए और सुरक्षा के लिए अधिक भंडार जमा करना चाहिए।</p>संजय कुमारअमित अग्रवाल
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3465010.64171/JSRD.5.S3.46-50भारत की वैश्विक स्थिति को आकार देने में लघु, कुटीर एवं मध्यम वर्ग उद्योगों का योगदान (उत्तराखंड के विषेष संदर्भ में)
https://dzarc.com/social/article/view/1085
<p>आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा के अंतर्गत उत्तराखंड राज्य ने अपने आर्थिक विकास को सुदृढ करने हेतु अनेक नवीन नीतिगत पहलें की है। राज्य की विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों एवं प्राकृतिक संसाधनों के कारण उत्तराखंड ने पर्यटन, कृषि, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) औषधीय एवं सुगंधित पौधो के उत्पादन जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। इन क्षेत्रो के विकास ने न केवल राज्य की आंतरिक अर्थव्यवस्था को गति प्रदान की है, बल्कि राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसके योगदान को सशक्त किया है। विगत वर्षो में उत्तराखंड में प्रति व्यक्ति आय में निरंतर वृद्वि दर्ज की गई है। जो राज्य की आर्थिक स्थिरता एवं विकासशील प्रवृत्ति को दर्शाती है। औद्योगिक इकाइयों की संख्या में हुई वृद्वि से रोजगार के नए अवसर सृजित हुए है, जिससे स्थानीय जनसंख्या की आय एवं जीवन-स्तर में सुधार हुआ है। विशेष रूप से पर्यटन उद्योग राज्य की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार बनकर उभरा है। जिसने सेवा क्षेत्र के विस्तार में प्रमुख भूमिका निभाई है। आत्मनिर्भर भारत पहल के अंतर्गत भारत सरकार द्वारा सतत एवं समावेशी आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अनेक योजनाएँ प्रारंभ की गई है। इन योजनाअेां का मुख्य लक्ष्य स्थानीय संसाधनों का प्रभावी उपयोग कर उत्पादन क्षमता को बढाना व स्वरोजगार को प्रोत्साहन देना तथा कुटीर एवं लघु उद्योगों की सशक्त बनाना हैं। उत्तराखंड में इन नीतियों के क्रियान्वयन से कृषि-आधारित उद्योगों, हस्तशिल्प तथा स्वंय सहायता समूहों को विशेष बढावा मिला है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है। कि उत्तराखंड ने आत्मनिर्भर भारत की सोच को अपनाते हुए अपनी आर्थिक संरचना को नई दिशा प्रदान की है। राज्य की पारंपरिक क्षमताओं एवं आधुनिक विकास रणनीतियों के समन्वय से उत्तराखंड न केवल राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहा है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी आत्मनिर्भर विकास के एक प्रेरणादायक माॅडल के रूप में उभर रहा है।</p>सुनील दत्तसंतोष कुमार आर्य
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3515510.64171/JSRD.5.S3.51-55नई शिक्षा नीति 2020ः हिंदी भाषा के माध्यम से समावेशी शिक्षा की दिशा
https://dzarc.com/social/article/view/1086
<p>नई शिक्षा नीति 2020 भारतीय शिक्षा व्यवस्था में एक ऐतिहासिक और दूरगामी परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करती है। यह नीति शिक्षा को केवल ज्ञान अर्जन का साधन न मानकर सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानवीय विकास का माध्यम मानती है। नीति का मूल उद्देश्य शिक्षा को अधिक समावेशी, समानतापूर्ण, गुणवत्तापूर्ण और भविष्योपयोगी बनाना है, ताकि समाज के प्रत्येक वर्ग - चाहे वह सामाजिक, आर्थिक, लैंगिक या भाषाई दृष्टि से वंचित क्यों न हो - को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके। इस संदर्भ में मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है, जिससे हिंदी भाषा को शिक्षा के एक सशक्त, सुलभ और प्रभावी माध्यम के रूप में पुनः प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है।<br>प्रस्तुत शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य यह विश्लेषण करना है कि किस प्रकार नई शिक्षा नीति 2020 हिंदी भाषा के माध्यम से समावेशी शिक्षा को सुदृढ़ करती है। अध्ययन में समावेशी शिक्षा की अवधारणा, भारतीय शिक्षा व्यवस्था में भाषा की भूमिका, हिंदी भाषा की सामाजिक-सांस्कृतिक उपयोगिता तथा नई शिक्षा नीति के प्रमुख भाषाई प्रावधानों का विस्तार से विवेचन किया गया है। साथ ही, यह भी स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि हिंदी के माध्यम से शिक्षा प्रदान करने से ग्रामीण, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, दिव्यांग तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के विद्यार्थियों की शिक्षा तक पहुँच कैसे सुनिश्चित की जा सकती है।<br>प्रारंभिक एवं माध्यमिक स्तर पर हिंदी और मातृभाषा आधारित शिक्षा न केवल विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता और आत्मविश्वास को बढ़ाती है, बल्कि विद्यालयों में नामांकन और निरंतरता को भी प्रोत्साहित करती है। इसके अतिरिक्त, डिजिटल शिक्षा और तकनीकी संसाधनों में हिंदी के प्रयोग की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला गया है, जिससे डिजिटल विभाजन को कम किया जा सके। अध्ययन के निष्कर्ष यह संकेत देते हैं कि यदि नई शिक्षा नीति 2020 के प्रावधानों को प्रभावी क्रियान्वयन, पर्याप्त संसाधनों और सकारात्मक सामाजिक दृष्टिकोण के साथ लागू किया जाए, तो हिंदी भाषा समावेशी शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है तथा एक अधिक समान, न्यायपूर्ण और सशक्त शिक्षित समाज के निर्माण में योगदान दे सकती है।</p>संध्या रानी
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3566010.64171/JSRD.5.S3.56-60समकालीन पारिवारिक मूल्यः राष्ट्र निर्माण के संदर्भ में
https://dzarc.com/social/article/view/1087
<p>आधुनिक समाज में पारिवारिक मूल्यों में तेजी से परिवर्तन हो रहा है। पहले संयुक्त परिवार प्रणाली प्रचलित थी, जिसमें सहयोग, त्याग, सम्मान और सामूहिकता जैसे मूल्य प्रमुख थे। आज के समय में एकल (न्यूक्लियर) परिवारों की संख्या बढ़ने से व्यक्तिवाद, स्वतंत्रता और निजी जीवन को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। इन बदलते मूल्यों का राष्ट्र निर्माण पर गहरा प्रभाव पड़ता है। परिवार व्यक्ति का पहला विद्यालय होता है, जहाँ से वह नैतिकता, अनुशासन, जिम्मेदारी और सामाजिक व्यवहार सीखता है। यदि परिवार में सकारात्मक मूल्य जैसे सम्मान, सहिष्णुता, ईमानदारी और सहयोग सिखाए जाते हैं, तो वही गुण नागरिक के रूप में राष्ट्र के विकास में योगदान देते हैं। हालाँकि, आधुनिकता और वैश्वीकरण के प्रभाव से पारिवारिक संबंधों में दूरी, बुजुर्गों की उपेक्षा, और नैतिक मूल्यों में गिरावट जैसी समस्याएँ भी देखने को मिल रही हैं। इससे सामाजिक एकता और नैतिकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। फिर भी, बदलते समय के साथ कुछ सकारात्मक परिवर्तन भी हुए हैं, जैसे महिलाओं की शिक्षा और स्वावलंबन, लैंगिक समानता, और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का बढ़ना। ये परिवर्तन भी राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अतः आवश्यक है कि हम पारंपरिक और आधुनिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखें। मजबूत पारिवारिक मूल्य ही एक सशक्त, नैतिक और प्रगतिशील राष्ट्र के निर्माण की नींव होते हैं।</p>विवेक पाठक
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3616510.64171/JSRD.5.S3.61-65वसुधैव कुटुम्बकमः वैश्विक शांति और भारत का नेतृत्व
https://dzarc.com/social/article/view/1088
<p>वसुधैव कुटुम्बकम का प्राचीन भारतीय दर्शन, जिसका अर्थ है "दुनिया एक परिवार है", सभी राष्ट्रों और समुदायों के बीच सार्वभौमिक भाईचारे, आपसी सहयोग और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर जोर देता है। भू-राजनीतिक संघर्षों, आर्थिक अस्थिरता, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य आपात स्थितियों और व्यापक उत्तर-दक्षिण असमानताओं से चिह्नित समकालीन वैश्विक व्यवस्था में, इस दर्शन ने नए सिरे से प्रासंगिकता प्राप्त की है। यह पेपर भारत की जी20 प्रेसीडेंसी पर विशेष ध्यान देने के साथ वसुधैव कुटुम्बकम के चश्मे के माध्यम से वैश्विक शासन में भारत की नेतृत्व भूमिका की जांच करता है। द्वितीयक आंकड़ों पर आधारित एक गुणात्मक और वर्णनात्मक दृष्टिकोण का उपयोग करते हुए, अध्ययन विश्लेषण करता है कि कैसे भारत ने समावेशी विकास, सतत विकास, जलवायु कार्रवाई, वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा और न्यायसंगत वैश्विक निर्णय लेने को बढ़ावा देने का प्रयास किया है। यह पत्र वैश्विक दक्षिण की आवाज को बढ़ाने, बहुपक्षीय संस्थानों को मजबूत करने और वैश्विक चुनौतियों के लिए सर्वसम्मति-आधारित समाधानों को बढ़ावा देने के भारत के प्रयासों पर प्रकाश डालता है। यह तर्क देता है कि भारत का मूल्य-संचालित नेतृत्व वैश्विक शासन में एक मानक परिवर्तन को दर्शाता है, जहां संकीर्ण राष्ट्रीय हितों पर नैतिक जिम्मेदारी, सामूहिक कल्याण और स्थिरता को प्राथमिकता दी जाती है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि वसुधैव कुटुंबकम तेजी से परस्पर जुड़े हुए विश्व में वैश्विक शांति और समावेशी वैश्विक शासन प्राप्त करने के लिए एक सार्थक ढांचा प्रदान करता है।</p>संजीव कुमार
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3666910.64171/JSRD.5.S3.66-69राष्ट्रीय एकता तथा मानवाधिकार शिक्षा
https://dzarc.com/social/article/view/1089
<p>मानवाधिकार शिक्षा को वर्तमान दौर की शिक्षा व्यवस्था का एक ज्वलन्त प्रकरण कहा जा सकता है। मानवाधिकार शिक्षा से तात्पर्य मानवाधिकारों के सुनिश्चियन में शिक्षा के योगदान को सुनिश्चित करने वाली शिक्षा से है। नैसर्गिक जन्मजात अधिकारों के रूप में अथवा सवैधानिक मूल अधिकारों के रूप में प्रत्येक व्यक्ति के कुछ सार्वभौमिक अधिकार माने जाते हैं एवं इन अधिकारों की पूर्ति करना प्रत्येक सभ्य समाज का एक अनिवार्य कर्तव्य माना जाता है। भारत जैसे प्रजातान्त्रिक राष्ट्र में संविधान के द्वारा प्रत्येक नागरिक को समता, स्वातन्त्र्य, शोषण प्रतिषेध धार्मिक स्वतन्त्रता, शिक्षा प्राप्ति व सांस्कृतिक संरक्षण जैसे अनेक अधिकार प्रदत्त किये गये हैं । अतः शिक्षा के माध्यम से प्रत्येक नागरिक को इन अधिकारों को जानने एवं आवश्यकतानुसार इनका प्रयोग करके अपने जीवन को सुखमय बनाना है। वस्तुतः अपने अधिकारों की रक्षा करने तथा दूसरों के अधिकारों में बाधा न बनने की शिक्षा देना ही मानवाधिकार शिक्षा है जिसकी वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में सख्त आवश्यकता है।</p>निरंजना शर्मा
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3707410.64171/JSRD.5.S3.70-74गढवाल में नाग पूजा परम्पराः एक अध्ययन
https://dzarc.com/social/article/view/1090
<p>उत्तराखण्ड के गढ़वाल हिमालय की धार्मिक-सांस्कृतिक परम्पराओं में नागपूजा का विशिष्ट स्थान है। यह परम्परा केवल आस्था या विश्वास का परिणाम नहीं, बल्कि यह प्रकृति, पर्यावरण, सामाजिक संरचना और ऐतिहासिक चेतना से गहराई से जुड़ी हुई है। गढ़वाल क्षेत्र में नागदेवता को जल, भूमि, वर्षा, उर्वरता, रोग-निवारण और ग्राम-सुरक्षा से सम्बन्धित देवता माना जाता है। यहां नाग केवल एक जीव मात्र नहीं, बल्कि ‘क्षेत्रपाल’ या ‘ग्राम-देवता’ के रूप में पूजनीय है। गढ़वाल की ‘जागर’ गायन परम्परा में ‘नागराज’ के अवतरण और उनके सांस्कृतिक प्रभाव की भी इस शोधपत्र में विवेचना की गई है। नागपूजा की परम्परा वैदिक, पौराणिक तथा लोकधाराओं के समन्वय से विकसित हुई है। पुराणों में वर्णित नागपूजा की यह परम्परा वर्तमान में भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी पूर्व में थी।<br>प्रस्तुत शोधपत्र मेें गढ़वाल क्षेत्र में नागपूजा के उद्भव, ऐतिहासिक विकास, पौराणिक एवं लोकाधार, प्रमुख नागदेवताओं और उनके मन्दिरों, अनुष्ठानों, पर्वों तथा सामाजिक-सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व का विश्लेषण किया गया है।</p>उदय प्रकाश
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3757810.64171/JSRD.5.S3.75-78कचरा प्रबंधन और पुनर्चक्रण (Recycling) को बिजनेस मॉडल में बदलकर मुनाफा कमाने की नई रणनीतियाँ
https://dzarc.com/social/article/view/1091
<p>वर्तमान समय में तीव्र शहरीकरण, औद्योगीकरण तथा उपभोक्तावाद के कारण ठोस अपशिष्ट की मात्रा निरंतर बढ़ रही है। पारंपरिक “उपयोग करो और फेंको” (Linear Economy) मॉडल पर्यावरणीय संकट, संसाधनों की कमी तथा आर्थिक असंतुलन को बढ़ावा देता है। इसके विपरीत “परिपत्र अर्थव्यवस्था” (Circular Economy) का मॉडल कचरे को संसाधन के रूप में पुनः उपयोग करने पर बल देता है। यह शोध-पत्र कचरा प्रबंधन एवं पुनर्चक्रण को लाभकारी व्यवसाय मॉडल में परिवर्तित करने की नवीन रणनीतियों का अध्ययन करता है। इसमें प्लास्टिक, ई-वेस्ट, जैविक कचरा, निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट (C&D Waste) तथा वस्त्र अपशिष्ट के पुनर्चक्रण से जुड़े स्टार्टअप्स, डिजिटल प्लेटफॉर्म, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), Extended Producer Responsibility (EPR), अपसाइक्लिंग (Upcycling) तथा हरित उद्यमिता के मॉडल का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि यदि तकनीकी नवाचार, सरकारी नीतियाँ, सामाजिक सहभागिता और निजी निवेश का समन्वय हो, तो कचरा प्रबंधन केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम न होकर एक अत्यंत लाभकारी उद्योग भी बन सकता है।</p>तरुण बाबू श्रीवास्तवविशाल शर्मा
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3798310.64171/JSRD.5.S3.79-83समकालीन भारतीय ग्रामीण समाज में महिला सशक्तिकरण के संदर्भ में गांधी और अंबेडकर के विचारों की प्रासंगिकता (स्वतंत्रोत्तर भारत में)
https://dzarc.com/social/article/view/1092
<p>पिछले दो दशकों में महिला सशक्तिकरण पर व्यापक विमर्श के बावजूद, राष्ट्रीय तथा विशेषतः ग्रामीण स्तर पर इसके वास्तविक आयामों और प्रभावशीलता का समग्र विश्लेषण अभी भी सीमित स्तर पर है। प्रस्तुत शोध आधुनिक भारतीय ग्रामीण समाज में महिला सशक्तिकरण और महिला वस्तुकरण के प्रश्न को एक जटिल सामाजिक यथार्थ के रूप में समझने का प्रयास करता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह विश्लेषण करना है कि अनेक संवैधानिक प्रावधानों, नीतियों और मानव अधिकार संबंधी उपायों के बावजूद महिलाओं को ग्रामीण स्तर पर समान अधिकार और सम्मानजनक स्थान क्यों प्राप्त नहीं हो पा रहा है? यह अध्ययन महात्मा गांधी और डॉ. बी.आर. अंबेडकर के वैचारिक दृष्टिकोण के माध्यम से महिला सशक्तिकरण की अवधारणा का एक तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। जहाँ डॉ. अंबेडकर महिला असमानता के मूल में जाति व्यवस्था एवं पितृसत्तात्मक संरचना को चिन्हित करते हुए शिक्षा, संपत्ति के अधिकार, संवैधानिक सुरक्षा तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सशक्तिकरण का आधार मानते हैं; वहीं गांधी ने इसे नैतिक शक्ति, सत्य, अहिंसा एवं सामाजिक चेतना के माध्यम से आंतरिक व सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया से जोड़ा। निष्कर्षतः, यह शोध दर्शाता है कि संवैधानिक अधिकारों के बावजूद पारंपरिक सामाजिक प्रथाएं, पितृसत्तात्मक सोच और संस्थागत कमजोरियां महिलाओं की वास्तविक प्रगति में अवरोध उत्पन्न करती हैं। यह अध्ययन सामाजिक-आर्थिक संरचना में सुधार, शिक्षा के उद्देश्य का पुनर्मूल्यांकन तथा ग्रामीण जागरूकता के विस्तार की आवश्यकता को रेखांकित करता है ताकि महिला सशक्तिकरण को व्यावहारिक और संभावित रूप से स्थापित किया जा सके।</p>Alok Kumar PandeyAnkita Chauhan
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3848910.64171/JSRD.5.S3.84-89