ग्रामीण महिला उद्यमिता के विकास में सूक्ष्म-वित्त संस्थाओं की भूमिका: एक विश्लेषणात्मक एवं नीतिपरक अध्ययन

Authors

  • डॉ. उमेश कुमार असिस्टेंट प्रोफेसर, वाणिज्य विभाग, के० ए० पी० जी० कॉलेज, कासगंज, उत्तर प्रदेश, भारत

DOI:

https://doi.org/10.64171/JSRD.5.2.100-106

Keywords:

ग्रामीण महिला उद्यमिता, सूक्ष्म-वित्त, स्वयं सहायता समूह, वित्तीय समावेशन, महिला सशक्तीकरण, आजीविका

Abstract

ग्रामीण भारत में महिला उद्यमिता केवल आय अर्जित करने का माध्यम नहीं, बल्कि संसाधनों पर अधिकार, घरेलू निर्णयों में भागीदारी, सामाजिक गतिशीलता और स्थानीय अर्थव्यवस्था के विविधीकरण की प्रक्रिया है। फिर भी संपार्श्विक का अभाव, अनियमित आय, सीमित वित्तीय साक्षरता, घरेलू देखभाल-दायित्व, बाजार से दूरी तथा पितृसत्तात्मक मानदंड महिलाओं की उद्यमशील क्षमता को बाधित करते हैं। इस संदर्भ में सूक्ष्म-वित्त संस्थाएँ—स्वयं सहायता समूह–बैंक संबद्धता कार्यक्रम, गैर-बैंकिंग सूक्ष्म-वित्त संस्थाएँ, लघु वित्त बैंक, सहकारी संस्थाएँ और दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के सामुदायिक संगठन—वित्तीय समावेशन और उद्यम-विकास के महत्त्वपूर्ण माध्यम बने हैं। प्रस्तुत अध्ययन संस्थागत और शोध-साहित्य सामग्री पर आधारित वर्णनात्मक-विश्लेषणात्मक समीक्षा है। इसका उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि सूक्ष्म-वित्त किस प्रकार बचत, ऋण, समूह-जमानत, वित्तीय अनुशासन, कौशल, सामाजिक पूँजी और बाजार-संपर्क के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आजीविका गतिविधि से स्थायी उद्यम की ओर ले जा सकता है। उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि ऋण तक पहुँच से कार्यशील पूँजी, परिसंपत्ति निर्माण, जोखिम-सहनशीलता और निर्णय-क्षमता में सुधार संभव है; समूह-आधारित मॉडल महिलाओं के आत्मविश्वास, सामूहिक सौदेबाजी और सार्वजनिक भागीदारी को भी बढ़ाता है। किंतु केवल ऋण देना उद्यमिता की पर्याप्त शर्त नहीं है। छोटे ऋण आकार, बहु-ऋणग्रस्तता, उच्च प्रभावी लागत, भुगतान-दबाव, डिजिटल विभाजन, कमजोर बाजार-सम्बद्धता और उद्यमों का कम उत्पादक गतिविधियों में संकेंद्रण लाभ को सीमित करते हैं। अध्ययन का केंद्रीय निष्कर्ष है कि सूक्ष्म-वित्त को ‘ऋण-वितरण’ से आगे बढ़ाकर ‘उद्यम पारितंत्र’ में रूपांतरित करना आवश्यक है, जिसमें चरणबद्ध वित्त, व्यवसाय-परामर्श, डिजिटल एवं लेखांकन कौशल, सामाजिक सुरक्षा, उत्पादक समूह, मूल्य-श्रृंखला साझेदारी और उत्तरदायी ग्राहक-सुरक्षा एकीकृत हों। उत्तर प्रदेश तथा कासगंज जैसे कृषि-प्रधान जिलों के लिए जिला-विशिष्ट क्लस्टर, पंचायत-स्तरीय उद्यम सुविधा केंद्र और परिणाम-आधारित निगरानी विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है।

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Published

2026-05-06

How to Cite

[1]
कुमार उ., “ग्रामीण महिला उद्यमिता के विकास में सूक्ष्म-वित्त संस्थाओं की भूमिका: एक विश्लेषणात्मक एवं नीतिपरक अध्ययन”, J. Soc. Rev. Dev., vol. 5, no. 2, pp. 100–106, May 2026.

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