राष्ट्रीय एकता तथा मानवाधिकार शिक्षा
DOI:
https://doi.org/10.64171/JSRD.5.S3.70-74Keywords:
मानवाधिकार शिक्षा, नागरिक, सामाजिक व्यवहार, राष्ट्रीय एकताAbstract
मानवाधिकार शिक्षा को वर्तमान दौर की शिक्षा व्यवस्था का एक ज्वलन्त प्रकरण कहा जा सकता है। मानवाधिकार शिक्षा से तात्पर्य मानवाधिकारों के सुनिश्चियन में शिक्षा के योगदान को सुनिश्चित करने वाली शिक्षा से है। नैसर्गिक जन्मजात अधिकारों के रूप में अथवा सवैधानिक मूल अधिकारों के रूप में प्रत्येक व्यक्ति के कुछ सार्वभौमिक अधिकार माने जाते हैं एवं इन अधिकारों की पूर्ति करना प्रत्येक सभ्य समाज का एक अनिवार्य कर्तव्य माना जाता है। भारत जैसे प्रजातान्त्रिक राष्ट्र में संविधान के द्वारा प्रत्येक नागरिक को समता, स्वातन्त्र्य, शोषण प्रतिषेध धार्मिक स्वतन्त्रता, शिक्षा प्राप्ति व सांस्कृतिक संरक्षण जैसे अनेक अधिकार प्रदत्त किये गये हैं । अतः शिक्षा के माध्यम से प्रत्येक नागरिक को इन अधिकारों को जानने एवं आवश्यकतानुसार इनका प्रयोग करके अपने जीवन को सुखमय बनाना है। वस्तुतः अपने अधिकारों की रक्षा करने तथा दूसरों के अधिकारों में बाधा न बनने की शिक्षा देना ही मानवाधिकार शिक्षा है जिसकी वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में सख्त आवश्यकता है।
References
प्रो0 गिरीश पचैरी - शिक्षा और समाज, आर लाल बुक डिपो मेरठ।
डाॅ0 रूचि हरीश आर्य - शिक्षा मनोविज्ञान, नील कमल पब्लिकेशन दिल्ली।
डाॅ0 वी0बी0 सिंह, सुधा पहूजा, आर लाल बुक डिपो मेरठ।
डाॅ0 एस0 पी0 गुप्ता, डाॅ0 अल्का गुप्ता, सारदा बुक भवन इलाहाबाद।
प्रो0 रामानन्द गैरोला - मानव अधिकार, किताब महल पब्लिकेशन दिल्ली।
भारत सरकार (आत्म निर्भर भारत) अभियान दस्तावेज, 2020।
भारत सरकार, शिक्षा मंत्रालय, नई शिक्षा नीति, 2020।
एस0 जोशी (2020), भारतीय दर्शन और आधुनिक शिक्षाशास्त्र, जयपुर - सुरभि प्रकाशन।
विवेकानन्द स्वामी (2009), प्राचीन भारतीय शिक्षा और संस्कृति पर व्याख्यान, कलाकत्ता - अद्वैत आश्रम।
जी0एस0 कुलकर्णी, (2012) भारतीय ज्ञान - परम्परा और आधुनिकता पुणें, भारतीय विद्या संस्थान।
