आत्मनिर्भर भारत और राज्य की भूमिकाः एक राजनीतिक विश्लेषण

Authors

  • डॉ. अर्चना सहायक प्राध्यापक, राजनीति विज्ञान विभाग, भक्त फूल सिंह महिला विश्वविद्यालय, खानपुर कलां, सोनीपत, हरियाणा, भारत

DOI:

https://doi.org/10.64171/JSRD.5.S3.38-41

Keywords:

आत्मनिर्भर भारत, राज्य की भूमिका, भारतीय राजनीति, सार्वजनिक नीति, कल्याणकारी राज्य, राजनीतिक अर्थशास्त्र, सामाजिक न्याय, वैश्वीकरण, रणनीतिक स्वायत्तता, नीति-निर्माण, लोकतांत्रिक सहभागिता, आर्थिक पुनरुत्थान

Abstract

आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना समकालीन भारतीय राजनीति, अर्थव्यवस्था और विकास विमर्श में एक केंद्रीय वैचारिक ढाँचे के रूप में उभरकर सामने आई है। वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी की अभूतपूर्व परिस्थितियों के बीच भारत सरकार द्वारा घोषित ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ ने यह स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रीय विकास की प्रक्रिया को केवल वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं और बाहरी निर्भरता के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इस अभियान का उद्देश्य आर्थिक पुनरुत्थान, घरेलू उत्पादन को बढ़ावा, रोजगार सृजन, तकनीकी एवं औद्योगिक आत्मनिर्भरता तथा राष्ट्रीय आत्मविश्वास के सुदृढ़ीकरण से जुड़ा रहा है। किंतु आत्मनिर्भर भारत को केवल एक तात्कालिक आर्थिक पैकेज या विकासात्मक रणनीति के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह राज्य की भूमिका के पुनर्संरचन से जुड़ी एक व्यापक राजनीतिक और संस्थागत परियोजना भी है।
आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा का ऐतिहासिक, वैचारिक और राजनीतिक विश्लेषण करता है। इसमें स्वतंत्रता आंदोलन के स्वदेशी विचार, गांधीवादी आत्मनिर्भरता की अवधारणा, नेहरूवादी नियोजित विकास मॉडल तथा 1991 के बाद के उदारीकरणोत्तर राज्य की भूमिका को आत्मनिर्भर भारत के वर्तमान स्वरूप से जोड़कर समझने का प्रयास किया गया है। अध्ययन यह दर्शाता है कि समकालीन भारत में राज्य की भूमिका केवल नीति-निर्माता तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वह एक कल्याणकारी, नियामक और सहभागी अभिकर्ता के रूप में भी उभर रहा है। उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाएँ, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम, डिजिटल शासन, स्टार्ट-अप एवं एमएसएमई को समर्थन तथा केंद्र-राज्य समन्वय इस बदलती भूमिका के महत्वपूर्ण आयाम हैं।
आत्मनिर्भर भारत की वास्तविक सफलता सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक सहभागिता और सहकारी संघवाद पर निर्भर करती है। यदि आत्मनिर्भरता की नीतियाँ समाज के कमजोर, हाशिए पर पड़े और वंचित वर्गों को सशक्त बनाने में असफल रहती हैं, तो यह अवधारणा अपने लोकतांत्रिक और नैतिक उद्देश्य से भटक सकती है। साथ ही, वैश्वीकरण के संदर्भ में आत्मनिर्भर भारत को अंतरराष्ट्रीय अलगाव के रूप में नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता, संतुलित वैश्विक एकीकरण और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। अंततः यह अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि आत्मनिर्भर भारत तभी सार्थक, समावेशी और टिकाऊ हो सकता है जब राज्य आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण के बीच संतुलन स्थापित करते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों, संस्थागत पारदर्शिता और नागरिक सहभागिता को सुदृढ़ बनाए रखे।

References

गांधी मोहनदास करमचंद. हिंद स्वराज. नवजीवन प्रकाशन, अहमदाबाद.

नेहरू जवाहरलाल. भारत की खोज. साहित्य अकादमी, नई दिल्ली.

कुमार कृष्ण. भारतीय राज्य और विकास. ओरिएंट ब्लैकस्वान, नई दिल्ली.

सेन अमत्र्य. डेवलपमेंट ऐज फ्रीडम. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली.

दत्त रमेश एवं सुंदरम के. पी. एम. भारतीय अर्थव्यवस्था. एस. चंद एंड कंपनी, नई दिल्ली.

भारत सरकार. आत्मनिर्भर भारत अभियान. नीति आयोग, नई दिल्ली.

भारत सरकार. आर्थिक सर्वेक्षण (विभिन्न वर्ष). वित्त मंत्रालय, नई दिल्ली.

नीति आयोग. भारत/2047रू विकास दृष्टि दस्तावेज. भारत सरकार.

योजना पत्रिका. भारत सरकार, विभिन्न अंक.

कुरुक्षेत्र पत्रिका. ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार.

द हिंदू. संपादकीय लेख (आत्मनिर्भर भारत एवं आर्थिक नीति से संबंधित).

हिंदुस्तान टाइम्स. अर्थव्यवस्था एवं नीति संबंधी लेख.

नीति आयोग की आधिकारिक वेबसाइट – www.niti.gov.in

भारत सरकार की आधिकारिक वेबसाइट – www.india.gov.in.

Downloads

Published

2026-05-29

How to Cite

[1]
अर्चना, “आत्मनिर्भर भारत और राज्य की भूमिकाः एक राजनीतिक विश्लेषण”, J. Soc. Rev. Dev., vol. 5, no. Special Issue 3, pp. 38–41, May 2026.