सतत विकासोन्मुख शिक्षक शिक्षा में स्वदेशी ज्ञान प्रणालियाँ, पाठ्यचर्या नवाचार एवं डिजिटल एकीकरणः एक समावेशी दृष्टिकोण
DOI:
https://doi.org/10.64171/JSRD.5.S3.8-12Keywords:
स्वदेशी ज्ञान प्रणालियाँ, सतत विकास शिक्षा, शिक्षक शिक्षा, पाठ्यचर्या नवाचार, डिजिटल एकीकरण, उत्तराखंड, समावेशी शिक्षाAbstract
यह शोध-लेख स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों को सतत विकास के लिए शिक्षा के साथ समेकित करने की संभावनाओं, औचित्य और शैक्षिक निहितार्थों का विश्लेषण करता है। अध्ययन का केंद्रीय तर्क यह है कि शिक्षक शिक्षा को केवल ज्ञान-संप्रेषण की प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से जड़ित, अनुभवात्मक, अंतर्विषयक और भविष्य-उन्मुख निर्माण-प्रक्रिया के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखादृविद्यालयी शिक्षा 2023 जैसे दस्तावेजों में स्थानीय संदर्भ, बहुविषयक अधिगम, मातृभाषा-आधारित शिक्षा और अनुभवात्मक शिक्षण पर बल दिया गया है, जो स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों दृसतत विकास के लिए शिक्षा समन्वय के लिए सशक्त आधार प्रदान करते हैं। उत्तराखंड जैसे हिमालयी क्षेत्र में पारंपरिक कृषि, जल-संरक्षण, वन-प्रबंधन, लोक-परंपराएँ, औषधीय ज्ञान और सामुदायिक जीवन-सरणियाँ शिक्षा के लिए जीवंत संसाधन हैं। अध्ययन यह भी दर्शाता है कि डिजिटल एकीकरण, आईसीटी और ज्ञान के डिजिटलीकरण के माध्यम से स्थानीय ज्ञान को संरक्षित, सुलभ और शिक्षण-अधिगम के लिए अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है। साथ ही, यह लेख शिक्षक तैयारी, पाठ्यचर्या पुनर्संरचना, समावेशिता, मूल्य-आधारित शिक्षा तथा नीति-क्रियान्वयन की चुनौतियों पर भी प्रकाश डालता है। निष्कर्षतः, स्वदेशी ज्ञान, सतत विकास के लिए शिक्षा और डिजिटल एकीकरण का समन्वय एक ऐसे शिक्षक निर्माण की ओर संकेत करता है जो सांस्कृतिक रूप से उत्तरदायी, पर्यावरण-सचेत, तकनीकी रूप से सक्षम और सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध हो।
यह शोध-लेख स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों को सतत विकास के लिए शिक्षा (सतत विकास के लिए शिक्षा) के साथ समेकित करके शिक्षक शिक्षा को अधिक समावेशी, संदर्भानुकूल और परिवर्तनकारी बनाने की संभावना का विश्लेषण करता है। अध्ययन का केंद्रीय तर्क यह है कि शिक्षा केवल पाठ्य-पुस्तकीय ज्ञान के संप्रेषण तक सीमित न रहकर स्थानीय जीवन, सांस्कृतिक विरासत, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और सामुदायिक अनुभवों से जुड़ी होनी चाहिए।
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