विकसित भारत की संकल्पना में प्राचीन व्यापार का वैशिष्ट्य
DOI:
https://doi.org/10.64171/JSRD.5.S3.1-3Keywords:
व्यापार संतुलन, आयात, निर्यात, रोम, मसालें, वस्त्रAbstract
किसी भी सभ्यता की बुनियाद उसकी आर्थिक संरचना होती है। समाज का निरन्तर विकास एक सुदृढ़ अर्थव्यवस्था पर निर्भर करता है इसीलिए प्राचीन भारत में प्रचलित पुरुषार्थ सिद्धान्त में ‘अर्थ’ को महत्व दिया गया था। प्राचीन काल में ‘अर्थ’ को अर्जित के प्रमुख साधनों में व्यापार भी शामिल था। आधुनिक युग में भी समाज को विकसित करने में व्यापार की भूमिका अत्यंत आवश्यक होती है। भारत को 2047 तक विकसित करने में व्यापार सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयाम सिद्ध होगा। व्यापार से देश का आर्थिक तंत्र मजबूत होता है। प्राचीन भारत के व्यापारिक अनुभवों को आत्मसात करके नवीन व्यापारिक तंत्र की मूर्त संकल्पना कर सकते हैं। भारत के आयात-निर्यात एवं व्यापार संतुलन को निर्धारित करके देश के व्यापार को समृद्ध किया जा सकता है। प्राचीन भारत के व्यापार में कई समयांतरालों भारत का व्यापार संतुलन सकारात्मक रहा है और प्राचीन भारत में विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन एवं निर्यात कर बहुत सा धन अर्जित किया जाता था। रोम से होने वाले व्यापार में भारत को वहाँ से हर वर्ष 55 करोड़ सेस्टर्स की प्राप्ति होती थी। मसाले, हीरे, इस्पात, वस्त्र आदि निर्यात प्रमुख वस्तुएँ थीं। रोम प्रतिवर्ष भारत की विलासिता सामग्री मँगाने पर 10 करोड़ सेस्टर्स व्यय करता था तथा अपने स्वर्ण से भुगतान करता था। ‘प्लिनी’ भारत की ओर इस स्वर्ण प्रवाह देखकर दुःख प्रकट करता है। इस प्रकार के व्यापार में प्राचीन भारत में व्यापार को अत्यंत लाभदायक बनाया था। अतः आधुनिक समय में भी अन्य देशों की आवश्यकतानुसार वस्तुओं का उत्पादन कर व्यापार में अच्छा लाभ अर्जित किया जा सकता था।
References
वही,
जातक 1, 320
थेरीगाथा 42
जातक, 1.109; 4.2
मिश्र, जयशंकर, प्राचीनकाल का सामाजिक इतिहास,
अर्थशास्त्र , 2.16
वही,
वही,
मेगास्थनीज-34
अर्थशास्त्र , 4.2
रामायण-अयोध्या काण्डा, 67.22
रामा, बालकाण्ड, अध्याय-6
महाभारत, आदिपर्व, अध्याय-199, 221
मिश्र, जयशंकर, प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास,
वही, पृ0 551
रघुवंश, 16.41; मालविकाग्निमित्र, पृ0 33, 801
वही, पृ0 17, 64
रघुवंश, 16.41; मालविकाग्निमित्र, पृ0 1112
कथासरित सागर, पृ0 85, कुवलयमाला कथा, पृ0 91।
